G. Sankara Kurup
जी. शंकर कुरुप

बाँसुरी (ओटक्कुष़ळ)

लीला-भाव से जीवित गीतों को गाने वालेदिशा और काल की सीमाओं से निर्बंध हे महामहिमामय !मैं जनमा था अज्ञात-अपरिचितकहीं मिट्टी में पड़े-पड़े नष्ट हो जाने के लिये,किन्तु तेरी वैभवशालिनी दया…

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माँ कहाँ है ? (अम्मयेविटे?)

"कहाँ है, कहाँ है माँ ?पिताजी, आप की आँखों सेक्यों बहे जा रही है आँसुओं की धार,क्यों आप गालों को धो रहे हैं बार-बार ?"-पूछ रहा है मुन्ना, इस तरह…

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पुष्पगीत ! एक (पुष्पगीतम् 1)

१श्याम सुन्दर,अनादि अनन्त,हे आकाश!तेरे विश्वव्यापी हृदय में से चू पड़ी हैस्नेह की एक शीतल ओस-बूंदजिस ने बना दिया है मुझ पुष्प कोपुलकित और पूर्ण-काम !जो हाथ सागर को भरते हैंवे…

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पुष्पगीत ! दो (पुष्पगीतम् 2)

१हे शाश्वत, जगत्प्राण !जब तुम शान्त निश्चल होकरखड़े थे आधी रात में, औरयद्यपि थे विश्व-भर में व्याप्तमैंने समझा यही कि तुम रूपहीन काअस्तित्व ही नहीं है।क्षमा करो इस अन्ध चपलता…

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सन्ध्या-तारा (सान्ध्यतारम्)

१हे आनन्दकन्द !बताओ तो, तुम कौन हो-विश्व-सौन्दर्य के ललाट पर अंकित बिन्दी के समान,वारुणी दिशा के कानों पर अलंकृतअम्लान मनोहर कर्णफूल के समान,नीलाकाश के तीर्थ में प्रवेश करअर्चना कर के…

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बाद का वसन्त (पिन्नत्ते वसन्तम्)

१अपने मधुर कण्ठ सेमधुमास की विजय-तुरही बजानेवाली कोयलघोषणा कर रही है :"पान करो अपने जीवन का मधुअविलम्ब, आकण्ठ,बहता जा रहा है समय-रूपी पीयूषसम्भव है तृषा-शमन का अवसर तुम्हें फिर न…

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वृन्दावन (वृन्दावनम्)

वृन्दावन की विटप शाखाओं पर विहार करनेवालेमन्दानिल का स्पर्श पाकर, हे मेरे मनअपनी पूत भावना के झीने पंखों को फैलाकरधीरे-धीरे आगे बढ़ो! देवताओं को भी पुलक-कंचुक-प्रद हैयह पुण्यमय कानन ।यही…

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कोयल (कुयिळ्)

"जीवन तो नहीं है उँगली की पोर जितनाकिन्तु कर्तव्य है विशाल व्योम-सा;तो फिर पिकवर,क्यों खोये दे रहे हो दुर्लभ वसन्त कोव्यर्थ ही गा-गाकर?" पथिक ने अपना प्रश्न जारी रखा-"इस विशाल…

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वन-जुही (काट्टुमुल्ळ्)

हे नियति के मृदु निर्मल हास,नयनों को चूमनेवाले नव्य प्रकाश,तुम हो अनुपम विश्वोत्सव के निमित्तआकाश पर ऊँचे फहरानेवाली लाल रेशमी ध्वजा । हे निष्पाप,तुम्हारी सुन्दरता के सागर मेंहिलोरें ले रहे…

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मेरा पुण्य (एण्ट्रे पुण्यम्)

मेरा पुण्य१मेरे चिर-संचित पुंजीभूत पुण्यों की प्रतीकमेरी प्रिया ने मनोहर मन्द-हास के साथ मधुर स्वर में पूछा-"आज फुलवारी जाने में इतना विलम्ब क्यों ?क्या फूलों से उदास हो गये हो?"…

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