वृन्दावन (वृन्दावनम्)

वृन्दावन की विटप शाखाओं पर विहार करनेवाले
मन्दानिल का स्पर्श पाकर, हे मेरे मन
अपनी पूत भावना के झीने पंखों को फैलाकर
धीरे-धीरे आगे बढ़ो!

देवताओं को भी पुलक-कंचुक-प्रद है
यह पुण्यमय कानन ।
यही वन आज भी सुरभित कर रहा है
नन्दगोप के उस पुण्यांकुर के शैशव को
जो इस भूमण्डल का भाग्य है,
देवकी देवी का प्राणोच्छ्वास है,
मंगलमयी गोप-बालिकाओं का
मंजुल रत्न-पदक है,
समस्त विश्व को आलोकित करने के लिए अवतरित
मुग्धकारी सुषमा-पूरित सुप्रभात है।

यह वन-स्थली ही तो है वह चकोरी
जिस ने सुधाकर की नवनील चन्द्रिका का पान किया,
यहाँ आज भी सुप्त पड़ी है
उस नीलमणि-वर्णवाले की कान्ति
इन घनी नीली घासों में,
इन पुलक-कण्टकित कदम्ब के पेड़ों में ।
अन्यथा उन्हें कालिन्दी क्या चूमती
अपने तरल मृदुल लहरों के अधरों से ?

गायों को चराता, बीच-बीच में बंसी बजाता,
वह माया-बालक यहाँ ही तो विचरा था !
उस के पैरों की वे मधुर मुद्राएँ
आज भी वन-प्रान्तर की सिकटाओं में
अमिट अंकित हैं।
सान्ध्य सूर्य की किरणें
शायद उन्हीं को चूमने के लिए
इस बीहड़ वन की अनुमति पाने को
आतुर हैं।

उस मनोहर पद-पल्लवों से अंकित
सिकता-भूमि पर
लोट-पोट होकर चला आया है पवन,
और गले लगा लेता है वेणुवन
उस अघहीन को!
शायद प्रकीर्ण पड़ा हो
उस बांसुरी का दिव्यनाद
यहाँ के काँटों में, कंकड़-पत्थरों में,
और इन आविल भू-विभागों में,
जो अनायास खींच लाने में पटु है
नभ में अरुन्धती और सप्तर्षियों से युक्त
नक्षत्र मण्डल को,
केलि-कुंजों में प्रेमार्द्र गोप-मानिनियों को।
इसीलिए तो यह आकाश कान लगाये
नितान्त मूक खड़ा रहता है।

चराचर को मुग्ध कर देनेवाला भव्य गीत
जब प्रवहमान हुआ, प्रेमिल प्रभु के
कोमल अधरों का स्पर्श करनेवाली स्नेह मुरलिका से
तो आनन्दोन्मत्त होकर सुनने लगे मृग-सिंह
भूल गये जाति-वैर!
तब भर गयीं पर्वत की भयानक गुफाएँ भी
इस की मधुरिमा से,
मिट गया स्वर्ग और भूमि का अन्तर
बन गये एक ही भवन के वे दो कक्ष,
नित्य बधिर वृक्षों ने भी
उस हृद्य संगीत का पान किया प्राणों से
करने लगे आनन्द-नर्तन,
अनुगान किया कानन के झरनों ने उस का।
न जाने कब देखेगी मेरी मातृभूमि यह दृश्य
परिवर्तित होने के लिए पूर्ववत् !

हो सकता है
यही शिलातल हो
माधव-दर्शन के लिए उत्सुक राधा की विहार-स्थली
चूम रही है जिसे बाल कदम्ब की मृदुल डाल ।
उस पुण्यशालिनी की
मृदुल प्रेमालाप की कोमल मधुकणिकाएँ
आज भी अक्षुण्ण पड़ी होंगी यहीं
इन शिलाखण्डों की दरारों में
जिन्होंने आगे धकेल दिया है धरा को
और स्वयं बन गये हैं ।
मृत अतीत की रीढ़ की हड्डी ।
राधा-देवी के पद-स्पर्शों से
पावन बने हुए इस प्रदेश को
छोड़ना नहीं चाहता कोयलों का झुण्ड,
पुलकित किया है अपने कोमल नाद से
कलिकाओं को जिन्होंने।
जीवन-सरिता के पार तक फैली हुई है
ऐसी स्मृतियों की छायाएँ।

मल्लिकाओं ने आज भी सुरक्षित कर रखा है
अपने पुष्प-सम्पुटों में
गहरे तम-सी कुटिल कुन्तला राधा की
श्वास-सुरभि को;
अन्यथा
क्यों जाता यह तरुण पवन
नित्य उस ओर
अपनी सांसों में गन्ध भरने?
इस श्रीमय प्रदेश पर आकर फूट-फूट पड़ती है
हेमन्त की रजनी;
हाय, इसी सैकत पर ही तो होता था
प्यारी राधा और कृष्ण का विहार!

यहाँ के प्रत्येक धूलि-कण में
बसा हुआ है
उस प्यारे फूल-से कोमल मन्द-हास का दुग्ध !
नहीं तो क्यों संध्या
यहाँ नित आकर श्यामल केशों से
मुंह ढंककर लौट जाती है नितान्त मूक,
और ध्यान-मग्न मूक गगन
बीच-बीच में जब इस ओर निहारता है
तो अपनी मन्द-स्मित प्रभा से
और भी धवल कर लेता है
अपना शरदभ्र-श्मश्रु ?
जब इस सैकत पर टहलती है स्निग्ध चन्द्रिका
हाथों में लिये सोम पुष्प की मंजूषा,
तब अत्यधिक नयन-मोहक हो जाती है
उस की अलौकिक धवलता!

ओ राधिके, वन्दनीय है तू,
सतत खोजने पर भी
जिस नीलरत्न को न पाया ऋषियों ने
वह तुम्हारे हाथों को स्वयं खोजता आ पहुँचा !
निश्चय ही प्रेम ज्ञान से श्रेष्ठ है।

हे कालिन्दी !
बिताया है तुम ने जीवन
मृदुल नीलांशुक बुन-बुनकर
सुन्दरी वृन्दावन-लक्ष्मी के लिए।
निरन्तर तुम्हारे तट पर बसकर
विलीन हो जाऊँ मैं राधाकृष्ण की उन स्मृतियों में
जिन्हें तुम ने अपने अन्तरंग में संजो रखा है।

राधाकृष्ण के मृदुल प्रेमालापों को
मर्मर ध्वनियों के बहाने गुंजरित करता हुआ
यह मनोहर वृन्दावन
विशुद्ध तीर्थचारियों को
सदा ही आनन्द प्रदान करे !

-१९२६

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