मेघ

परम पुरुष की कौन सी महिमा का
ढिंढोरा पीटते हुए घूम रहे हो, हे मेघ?
किस परमानंद निधि से
उठकर जा रहे हो कहाँ?
भाव-बाग के भक्ति बीज को
हर्ष जल बरसाते हुए
देवदेव की दिव्यकांति को
हृदयस्थल में अपने बिखेर रहे हो।

गिरिशिखरों पर से उड़ते जाकर,
जा मिलते नामी नगरियों में
थके प्यासे सुमनों को
देते हुए अतुल आनंद;
छोटे तिनकोंवाले वनों पर, कृपा कर नूतन
जीवकांति को उनमें भरते
धीरज भरते वर-सरोवरों में
घूमते रहते हो, हे जलधर!

रवि है जनक, जननी है शरधी
गगन है दाई तुम्हारी;
धरणी है सखी, कानन
दोस्त हैं हर्ष सारे पहुँचानेवाले;
गरज हैं किंकर, बिजली है सेविका,
बरखा है तनुजात;
इंद्रचाप ही पिता से प्रदत्त
सप्तरंगों का हार है।

उदयकाल में अरुण कांति का
सौंदर्य पाकर होते हो शोभित;
सायं गगन में शोणितांबरधारी
बन करते हो मन को रंजित;
आनंददायी कौमुदी से होगे जब
करते कवि को संतोष दान;
घोषित करते हो आनंद ही।
है दिव्यसौंदर्य परम पुरुष का।

नन्हें मुन्ने बालकों पर कृपा कर चित्रित करते हो
नभ में अमरावती उनके लिए;
झुठलाए बिना बालकों की कल्पनाओं को
रच देते हो भाँति भाँति के पतंग;
बनोगे कभी हाथी, कभी सिंह
तो बनोगे कभी राक्षस भी;
बनोगे वन कभी, गिरि कभी
तो बनोगे नदी भी कभी।

ब्रह्म से जनम लेकर, ब्रह्म में ही
विलीन होनेवाले जीव के जैसे;
सागर से जनम ले आकर
सागर में समा जाओगे;
अकेले विचरनेवाले कवि की चेतना जैसे
करते पान अमृत का आते हो;
धरती पर उतरकर और अंत में
करते पार देश-विदेशों को
पहुँच जाते हो सागर के लक्ष्य को।

पवन मार्ग के पुण्य यात्री
काशी है तुम्हारी कौन सी?
कौन से पर्वत कूट पर बन जाते हो
अभ्यागत तुम बताओ, हे जलधर?
चैत्रपल्लव शोभिताश्रम है बनता
तुम्हारे लिए कौन सा, हे संचारी?
तुम हो निर्मल आत्मा के दिव्य यात्री,
हे पुण्य जलधर, मंगल हो तुम्हारा।

कन्नड़ कविता हिन्दी में : कुपल्ली वेंकटप्पागौड़ा पुटप्पा (कुवेम्पु)
Kannada Poetry in Hindi : Kuppali Venkatappa Puttappa (Kuvempu)

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