माँ कहाँ है ? (अम्मयेविटे?)

“कहाँ है, कहाँ है माँ ?
पिताजी, आप की आँखों से
क्यों बहे जा रही है आँसुओं की धार,
क्यों आप गालों को धो रहे हैं बार-बार ?”
-पूछ रहा है मुन्ना, इस तरह रो-रोकर
कि वज्र भी पिघल जाये !
लाल प्रवाल जैसे उस के होंठ प्रश्नाकुल हैं ।

अस्त सागर के छोर पर पहुँचने के लिए
अत्यन्त उल्लास-विकल सूर्य-शिशु
आह्लाद की किलकारियाँ भरता हुआ
निर्मल सन्ध्या के मनोरम आँचल को
बार-बार घसीटे जा रहा है।

दिनान्त हो गया है,
एक छोटा सितारा अम्बर की ऊपरी मंज़िल पर
खड़ा है अत्यन्त विपन्न और पीत-वर्ण
क्योंकि नहीं दिखाई दे रही है कहीं भी उसे
अपनी माँ, रात्रि ।

वात्सल्य से विकल होकर गोद में उठा लेने के लिए
जब आती है रात्रि बालचन्द्र के साथ
तो सागर आनन्द-विह्वल होकर
लोट-पोट हो जाता है
सिकताओं की प्रभापूर्ण शैया पर !

भूमि और सागर के इन सभी प्रदेशों में
सदा ही माँ को खोजनेवाला बाल-पवन
निराशा से पराभूत और नितान्त दीन
बिलख-बिलखकर रो रहा है
“कहाँ है, कहाँ है माँ ?”
प्यारे मुन्ने!
तू ने शोकाकुल होकर जिस देवी को पुकारा है
वह तो स्वर्ग में निवास कर रही है,
देख तो, वहाँ उसे कितने सारे नक्षत्रों को
निरन्तर पालना-पोसना है, अपना प्यार देना है !

-१९२४

This Post Has One Comment

Leave a Reply