भूमिका ओटक्कुषल् (बाँसुरी) : जी. शंकर कुरुप

Bhoomika Otakkuzhal : G. Sankara Kurup

मेरी कविता

प्रकृति की कनिष्ठा सन्तान होने के कारण विश्व की अपेक्षा मनुष्य आयु में बहुत छोटा है। आज भी उसका जीवन शिशु-सहज कौतुकों से भरा है। रूप, नाद, रस, गन्ध तथा स्पर्श द्वारा उस की ज्ञानेन्द्रियाँ निरन्तर जागरूक हैं। ये ज्ञानेन्द्रियाँ हृदय तथा आत्मा को मोहित करनेवाला वृत्तान्त मनुष्य को सदा सुनाती आयी हैं। यह वृत्तान्त कितना भी लम्बा क्यों न हो, मनुष्य की आत्मा को वह कभी बुरा नहीं लगता। आत्मा को तो इस बात का दुःख रहता है कि नयी अनुभूतियों के वृत्तान्त लाने के लिए मनुष्य के पास नयी इन्द्रियाँ नहीं हैं। आत्मा में इस कारण एक प्रकार की असंतृप्ति बनी रहती है।

ज्ञानेन्द्रियों द्वारा अवगत होनेवाला मनुष्य हृदय में एक कौतुकपूर्ण जिज्ञासा जाग्रत करता है। जब कल्पना, चिन्तन आदि मानसिक प्रक्रियाओं द्वारा प्रकृति का प्रतिबिम्ब आत्मा पर पड़ता होता है, तब मनुष्य हृदय में जाग्रत जिज्ञासा, उस प्रतिबिम्ब का विश्लेषण करने तथा उसको संचय करके एक कथावस्तु के रूप में प्रकट करने के लिए तत्पर हो जाती है। विश्व, विज्ञान तथा कला का यह सजीव स्रोत किसी के भीतर निरन्तर बहता रहता है तो किसी में तुषार कण की तरह प्रकट होकर विलीन हो जाता है। मेरी आत्मा के किसी उच्च स्तर पर आज भी बहने वाले उस स्रोत ने ही कदाचित मेरे हृदय में प्रकृति एवं मनुष्य जीवन को ध्यान से देखने तथा उनका अध्ययन व आस्वादन करने का कौतुक उत्पन्न किया हो। यह आत्मीयता का भाव ही मेरी अकिंचन तथा अपूर्ण कविता का उद्गम है।

कुछ लोगों का मन्तव्य है कि वैज्ञानिक अभिज्ञता बढ़ने के साथ विलक्षणता कम होने लगती है तथा चिन्तन शक्ति के प्रहार से कल्पना का प्रसाद ढह जाता है। मुझे यह मान्यता ठीक नहीं लगती। सूर्य-मण्डल के सम्बन्ध में मनुष्य की वैज्ञानिक जानकारी बहुत बढ़ गयी है। क्या उस जानकारी के कारण पृथ्वी तथा ग्रह मनुष्य की दृष्टि में और भी अधिक रम्य नहीं बने हैं ? अपने प्रसन्न मुख पर प्रेम की ऊष्मता लिए अनन्त आकाश से कभी झुककर और कभी सीधे निर्निमेष देखने वाला नित्य प्रेमी सूर्य तथा ऋतु-परिवर्तन की विचित्रता लिये अपनी तिमिर केशराशि को पीठ पर फैलाये विविध रंगों में सजकर विविध शब्दों के साथ स्वयं घूम-घूम कर नृत्य करने वाली पृथ्वी—इन सब के भव्य काल्पनिक चित्र मेरे लिए आज भी दर्शनीय हैं। एक क्षुद्र ‘सेल’ रमणीय सुन्दरी शकुन्तला के रूप में विकसित हो जाता है। क्या इस वैज्ञानिक सत्य में कल्पना की उड़ान के लिए स्थान नहीं है ? वास्तव में विज्ञान की कल्पना का क्षेत्र विस्तृत होता है तथा कौतुक बढ़ता है। बचपन के दिनों की बात है। इडव (ऋषभ राशि का तद्भव रूप। केरल के महीने का नाम) मास की अँधेरी रातों में जब मैं अपने छोटे घर के बरामदे में बैठकर, घने बादलों की गोद से निकल कर उसी में छिप जाने वाली बिजली को देखता तो न जाने क्यों, उछल पड़ता। आज मैं बिजली से अनभिज्ञ नहीं हूँ। वह मेरे परिवार का ही अंग बन गयी है और इस समय मेरी मेज के पास खड़ी होकर, पतले काँच के झीने अवगुंठन के भीतर से मेरी लेखनी उसे देख-देख कर मुस्करा रही है। फिर भी विद्युत की अप्सरा के प्रति तथा उसको बाँध कर रखने वाले मनुष्य के प्रति मेरा कौतुक रत्ती भर भी कम नहीं हुआ है। अपने शरीर पर हाथ लगाने की अविवेकी कृत्य करने वालों को भष्म कर देने वाली बिजली क्या चरित्रगुण में दमयन्ती से कम है ? वैज्ञानिक अभिज्ञता कवि कल्पना के पंखों को सत्य की रक्त शिरायें प्रदान करती है और उनमें उड़ान की शक्ति भर देती है।

कला-कविताः

कौतुक से सजीव कल्पना विश्व तथा मनुष्य जीवन को अपनी ओर खींचने तथा अपने बाहुपाश में करने के लिए हाथ बढ़ाती रहती है। इसलिए उसके हाथ बलिष्ट होते हैं और उसकी पहुँच दूर तक होती है। मन में बिजली-जैसी उठने वाली प्रक्रिया जब मनुष्य हृदय में और विश्व-हृदय में भी अपनी प्रति-ध्वनि सुनने के लिए मचलने लगती है तब हमें सर्वव्यापी एकता की अनुभूति होने लगती है। कल्पना तथा मानसिक प्रक्रिया का यह कार्य जितना शक्तिशाली होता है उतना ही कलाकार का महत्त्व भी बढ़ता है। कवि हृदय एवं प्रकृति के बीच, मधुर कल्पना तथा आर्द भाव-युक्त संयोग से उत्पन्न होने वाली अनुभूति का घनीभूत रूप ही कथावस्तु है। कल्पना कथावस्तु का प्राण है तो मानसिक प्रक्रिया है उसकी शिराओं में दौड़ने वाला जीव-रक्त ! कल्पना-सुरभित तथा भाव-निर्मित इन कथा-वस्तुओं में प्रकृति तथा मानव आत्मा की छाप स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। यह छाप ही कलाकार का व्यक्तित्व है। कथा-वस्तुओं का प्रकाश ही कला है। अपने कलात्मक जीवन की अनुभूतियों से कविता के सम्बन्ध में यही कुछ समझ पाया हूँ।

मेरे लिए कविता आत्मा का प्रकाश मात्र है। जैसे धूसर क्षितिज पर सन्ध्या की छवि प्रतिबिम्बित होती है वैसे ही बन्धुर छन्दों के पदबन्धों में कवि का हृदय प्रतिबिम्बित होता है। इस आत्म-प्रकाश से और कुछ बने या न बने, किन्तु एक कलाकार के लिए यह परमानन्द का कारण तो है ही। जैसे मन्द पवन हंस के पंखों को ऊपर उड़ा ले जाता है वैसे ही परमानन्द की यह अनुभूति एक कलाकार की आत्मा को भीतर शरीर से परे उठा ले जाती है। प्राचीन मनुष्य द्वारा गुहा-भित्ति पर अंकित हिरन के चित्र को ही लीजिए। जब मनुष्य के हृदय से निकल कर वह हिरन अचल शिला पर दौड़ने लगा तब उसके साथ उस मनुष्य की आत्मा ने कितनी उड़ाने भरी होंगी। उस मनुष्य की अनुभूति का वह प्रतीक जब उसके मित्रों के हृदयों को भी पुलकित करने लगा तब यो भी उसके निकट खिंच आने लगे। इस प्रकार जो केवल एक व्यक्ति की आत्मा का प्रकाश था उस का एक सामाजिक मूल्य उत्पादन हो गया। एक कवि के होने के कारण अपनी अनुभूतियों का प्रकाश ही मेरे लिए परमानन्द का विषय है। और यदि उस आनन्द का आस्वादन अन्य लोगों को भी करा सका तो वह मेरी विजय होगी। उस से मेरी कला को सामाजिक आधार मिलेगा। लोगों का उत्कर्ष अन्य लोगों के द्वारा हो अथवा मेरे द्वारा ! यह अनुभूति कैसी वांछनीय है, और कितनी आत्म-संतृप्ति है उसमें।

कविता व्यक्तिगत अनुभवों का प्रकाश है। ‘मुत्तकळ्’ नामक अपने कविता-संग्रह में मैंने अपनी यह धारणा प्रकट की थी। जीवन के यथार्थ अनुभवों के आघात से हृदय में उत्पन्न होने वाली मधुर संवेदनाओं की कल्पना का आवरण पहना कर प्रकट करना ही रचना है। उसमें व्यक्ति की प्रधानता रहती है। ‘इल्युजन ऐण्ड रियलिटी’ नामक एक पुस्तक मैंने पढ़ी थी। उस पुस्तक में उपर्युक्त कथन का प्रतिवादन यह प्रमाणित करने के लिए किया गया था कि कला व्यक्ति की नहीं समाज की सृष्टि है। ये दोनों बातें परस्पर विरोधी लगती हैं। किन्तु वास्तव में हैं एक ही सत्य के दो पहलू। क्योंकि व्यक्तिगत अनुभव सामाजिक अनुभवों का अंग है और व्यक्ति सामाजिक परिस्थितियों की उपज है। मेरे गाँव के हरे मैदान, सुनहरे खेत, ग्राम्य हृदय में मस्तक ऊँचा किये खड़ा रहने वाला प्राचीन मन्दिर, दरिद्रता में डूबा हुआ प्रतिवंश, कवि कल्पना को अपने पास बुलाने वाली पहाड़ियाँ इन्हीं सब ने मेरे हृदय को स्वप्नों से भर दिया था और फिर उन स्वप्नों को विविध रंगों से सजाया तथा वाणी देकर सजीव बनाया था। वह खेत जिसमें कंगन-हंसियों की चमक दिखाई देती है, सिर पर धान का बोझा लिये चलने में हाँफती हुई वे कृषक कन्याएँ, अपनी झोपड़ी की ड्योढ़ियों पर बैठे रहनेवाले पुलयर1, सन्ध्या के शान्ति पूर्ण वातावरण में मधुरता फैलाता हुआ मन्दिर से आने वाला शंखनाद—इन सब से मेरे कल्पना-समुद्र में अव्यक्त एवं विचित्र तरंगें उठी हैं।

मरणोन्मुख सामन्तशाही तथा पाखण्डी पुरोहितों के अत्याचार के कारण गाँव का जीवन विकृत हो रहा है, यह बात बचपन के उन दिनों में मैं नहीं समझता था। तो भी सामन्ती पाखण्डियों तथा उनके नियमों के प्रति मेरे हृदय में लेशमात्र आदर नहीं था। मेरे हृदय में जब मेरा व्यक्तित्व अंकुरित हुआ तब उसकी वायु तथा प्रकाश का आहार मिला, मेरे गाँव के वातावरण से। इसलिए मेरी कविता भी उस ग्राम-हृदय का एक अंग है। उसके बाद जब अध्यापक का काम करने लगा तब एक और गाँव का प्रभाव मेरे हृदय पर पड़ा। ‘तिरुविल्वामला’ का विशाल हृदय की तरह फैला हुआ स्वप्न-सान्द्र मैदान, टीलों-वनों में आँखमिचौनी खेलती हुई संकेत स्थान पर आ मिलनेवाली नदियाँ, हाथों में जल कुम्भ लिए खड़े रहने वाले मेघ, तराई के मार्ग पर मन्दगति से जानेवाली बैलगाड़ियाँ ये सब दृश्य हैं जिनके कारण एकान्त में भी मैं एकाकी नहीं था। वे दृष्य मेरे व्यक्तित्व के विकास में सहायक रहे। ‘एकादशी’ के पर्व के अवसर पर दयालुओं की उदारता की आशा में मार्ग पर मिट्टी की थाली रख कर दूर जा खड़े होनेवाले नायाड़ियों2 को देख कर मुझे दारिद्रय, तथा छूत-छात क्रूरता के साथ-साथ किसी समय स्थापित हुए आर्यों के उपनिवेश का स्मरण हो आता तो भी मनुष्य को प्रकृति चित्र के कतिपय बिन्दुओं की तरह ही मैं देख सका था। सम्भव है उस समय प्रकृति चित्र को संवेदनाओं के उत्ताप से सजीव बनाने के लिए ही मेरा मन मनुष्य को ढूढ़ता था। किन्तु आज मैं प्रकृति-चित्र से भिन्न मनुष्य के आदर्शमय अस्तित्व का वास्तविक चित्र देखता हूँ।

बाल्यकाल : स्मृतियाँ

एक ऊजड़ गाँव के छोटे परिवार में मेरा जन्म हुआ था । आर्थिक दृष्टि से दीरद्र होने पर भी मां तथा मामाजी के वात्सल्य धन की गोद मे मैं पला था । पिताजी को अभी आंख भर देख भी न पाया था कि उन का देहान्त हो गया । मेरे पिताजी मुझे शोकसागर मे छोड़ कर चले गये और मेरे भीतर एक ऐसी रिक्तता छोड़ गये जिस की पूर्ति असम्भव है । उन को स्मरण करते हुए मेरा मन कभी कभी किसी अदृश्य लोक मे पहुँच जाता ओर आध्यात्मिक ज्ञान से अपनी झोली भर कर लौट आता । मेरी मां का हृदय प्रकृति के समान विशाल था । मेरे मामाजी चाहते थे कि उन का भानजा शीघ्रातिशीघ्र आदमी बन जाये । तीन वर्ष की आयु में उन्होंने मेरा विद्यारम्भ कराया एवं आठ वर्ष की आयु तक पढ़ाया । उन्होंने न तो मुझे खेलने दिया न सखाओं के साथ मिलकर ऊधम मचाने दिया । मेरा शारीरिक नही मानसिक स्वास्थ्य उन का अभीष्ट लक्ष्य था । बचपन में ही आदमी बन जाना कोई अच्छी बात नहीं । किन्तु मैं उसी रास्ते पर चल रहा था । अमर कोश, सिद्धरूपम्, श्रोरामोदन्तम् आदि ग्रन्थ कण्ठस्थ हो चुके थे । रघुवंश काब्य के कई श्लोक पढ़ चुका था । ऐसे समय सौभाग्यवश मेरे गाँव में एक प्राथमिक पाठशाला की स्थापना हुई । मामाजी ने मुझे पाठशाला के दूसरे वर्ग में भर्ती करा दिया । इस प्रकार कठिन अनुशासन में संस्कृत काव्यों को कण्ठस्थ करने के काम से छुट्टी मिली । साथ ही साथ अपनी इच्छा के अनुसार स्वतन्त्र रूप से काब्य रसास्वादन की प्रेरणा मन में जाग उठी । मेरे मामाजी के पास भाषा टीका के साथ संस्कृत काव्यों के बहुत से ग्रन्थ थे । मैं उन्हें पढ़ने लगा । कविता के प्रति कौतुक बढ़ाने वाली उस शिक्षा के प्रति अपना ऋण मैं कृतज्ञता के साथ स्वीकार करता हूं । संस्कृत काब्य जगत् मे प्रवेश करने का जो द्वार मेरे लिए उस समय खुला था उस को मैने आज तक बन्द नही होने दिया । इसी तत्परता के रूप मे मैं अपनी गुरुदक्षिणा देता रहूँ यही मेरी कामना है ।

कविता की ओर मुझे उन्मुख कर देनेवाली एक और घटना भी घटी । 1087 के (मलयालम संवत् ) लगभग जब मैं ग्यारह वर्ष का था, महाकवि कुंजिकुट्टन तंपुरान अपने कुछ नंपूतिरि मित्रों की प्रेरणा से मेरे घर के समीपस्थ इतिहास प्रसिद्ध मन्दिर मे पधारे । (चेरमान् पेरुमाल् द्वारा गुरुपदेशानुसार निर्मित कहे जानेवाले प्रस्तुत मन्दिर के बारे मे बहुत सी दन्तकथाएं प्रचलित हैं । मम्दिर की भित्ति पर अंकित चित्र कला प्रेमियों को आकर्षित करनेवाले हैं ।) चेङ्ङलूरमन के हाथों को उत्सवाघोष के लिए लाये जाने पर जो अद्भुत आह्लाद प्रकट किये गये वही सब कुछ महाकवि के आगमन पर भी गांव मे परिलक्षित हुए । “कवि बनना एक महान दैवी सिद्धि है” शायद मुझे उस दिन ऐसा लगा हो्गा । तंपुरान् के प्रति मेरे मन मे उत्पन्न आदर औरर पक्षपात वर्षों तक रहा । किन्तु बाद को उन की कविताओ मे से कुछ ही ने कविता की हैसियत से मुझ को आनन्दित किया है । शायद केवल भावगीतों को ही (लिरिक) कविता मान बैठनेवाली मेरी मुग्धता ही इस का कारण हो । साहित्य की ओर मुझे आकर्षित करने वा्ली एक प्रमुख घटना थी यह मुलाकात । मेरी माताजी गर्व का अनुभव किया करती थीं कि आठवें महीने मे शंकर चलने लगा । उसी तरह मातुल भी कहा करते थे कि उसने नबें वर्ष मे कविता लिखी । आज लज्जा के साथ मैं याद करता हूं कि वे सब पद्य की हैसियत से भी मूल्यवान प्रयास नहीं थे । जव मैं चौथी कक्षा में पढ़ता था अपने एक सहपाठी के प्रति उत्पन्न कृतज्ञता पर अपने पुराने घर के किसी कोने मे बैठकर संस्कृत के छन्दों में कुछ पंक्तियाँ लिखीं । (वह सहपाठी, जिसने पीलिया के आघात से कक्षा मे चक्कर खाकर गिर जाने पर मुझेको अपने कंधे पर उठाकर एक मील पैदल चलकर घर पहुंचाया था, आज ज़िन्दा नहीं है ।) वे पंक्तियाँ भी छन्दों के बन्धन मे रहने की शिक्षा प्राप्त अक्षर मात्र थीं । एक कुटुम्बी मित्र ने, जो ’कान्त छन्द’ का लक्षण देखकर मात्रा और पंक्तियों को मिलाते थे, मेरी जो प्रशंसा की, वह शायद उन के सौजन्य के कारण । ’अक्षरश्लोक ’ एवं तुकबन्दी –ये दोनों, विद्यार्थियों में से हम कुछ लोगों के लिए मध्याह्न भोजन के स्थान पर होनेवाला कार्यक्रम बना हुआ था । क्षीरसागर मन्थन की कथा को विभाजित कर मैं और मेरे मित्र ने जो शतक लिखा उस को सुनकर पेरुम्पावूर स्कूल के सातवीं कक्षा के अध्यापक ने कहा — “शतक सुनाने की परीक्षा आ रही है ।”

उस अवस्था से ही मैं साम्यवाद के पक्ष में दरिद्रों के साथ रहा हूं । प्रसिद्ध वाग्मी एवं प्रशस्त समाजसेवक श्रो एम0 एन0 नायर, जो बाद में सर्विस सोसाइटी की सेवा में चले गये मुवाट्टुपुषा मे मेरे अध्यापक थे । वे मुझे बड़े लाड़ प्यार से प्रोत्साहित किया करते थे । ब्रिटिश हिस्ट्री और अर्थशास्त्र वे ही पढ़ाते थे । सोश्यलिज्म के पर्यायवाची शब्दों के तौर पर वे कभी समष्टिवाद और कभी ’समाजसमत्ववाद’ के शब्द इस्तेमाल करते थे । “अपनी समस्त सम्पदा को समाज की सम्पत्ति बनाकर समान रूप से उपभोग करने के लिए जो सन्नद्ध है वे खड़े हो जायें”, एक दिन गुरुजी ने हंसते हुए कहा । मैं उठ खड़ा हुआ । “इस से तो शंकर कुरुप की कोई सम्पत्ति नष्ट होनेवाली नहीं है न ?” हंसते हुए फिर जब गुरुजी ने पूछा तो मई लज्जित भी हुआ ही । बाद को ही मुझको पता चला कि एशिया के राष्ट्रों में मुझ से कम सम्पत्ति रखनेवाले ही मेरे जैसे सम्पत्तिवालों से कहीं अधिक हैं ।रूस उन दिनों आर्थिक क्रांति का द्वार खटखटा रहा था ।

मामाजी ने मेरे हृदय में ज्ञानतृष्णा की जो लौ लगायी थी उस की ज्वाला बढ़ती गयी, यही मेरे लिए बड़े सौभाग्य का विषय है। ‘तिरुविल्वामला’ में जब मैं अध्यापक बन कर गया तब मुझे इस बात का आनन्द था कि वहां रह कर अंगरेजी भाषा तथा साहित्य से परिचय करने का अवसर मिलेगा । मेरे कविता-संग्रह ‘साहित्यकौतुकम्’ के प्रथम भाग की कविताएँ “तिरुविल्वामला’ जाने के पहले की हैं । मुझे उस समय ही लग रहा था कि मेरे मन के विकास के लिए आवश्यक प्रकाश मुझे अपनी उस समय की शिक्षा से नहीं मिला था। तिरुविल्वामला में आकर मैंने अपने अध्यापक मित्रों को गुरु बनाया और उन को सहायता से अंगरेजी पढ़ना आरम्भ किया। टैगोर और उमर खैय्याम के अतिरिक्त बहुत से अंगरेजी कवियों समालोचकों के पास सविनय पहुंचने का मार्ग इस तरह मेरे सामने न खुलता तो ‘साहित्यकौतुकम्’ की सीमा से कदाचित् मैं आगे न बढ़ पाता । यह नया मार्ग मुझे संस्कृति की खान की ओर ले गया। मेरे कल्पना-क्षितिज को विस्तृत तथा आदर्श-बोध को विकसित करने में टैगोर का जितना हाथ था उतना शायद किसी और का न रहा हो। उमर खैय्याम ‘हाफ़िज़’ आदि फारसी कवियों से परिचय होने पर मुझे लगा कि उनकी कविताओं में कल्पना के परिमार्जन पर नहीं, प्रतिपादन की रीति पर विशेष ध्यान दिया जाता है। अंगरेजी साहित्य मुझे गीति के आलोक की ओर ले गया ।

मेरी आयु बीसवीं शताब्दी से केवल छह महीने कम की है। प्रथम विश्वयुद्ध के समय जर्मनी की विजयों की वार्ता सुनता तो मेरा विवेक शून्य हृदय आनन्द से नाच उठता क्योंकि उसमें पराजय हो रही थी मेरी मातृभूमि को पैरों तले कुचलने वाले ब्रिटिश साम्राज्य की। गांधीजी के नेतृत्व में होने वाले स्वतन्त्रता संग्राम तथा धार्मिक क्रान्ति ने मेरे हृदय में देश-प्रेम का मन्त्र फूंका। रूस की आर्थिक तथा सामाजिक क्रान्ति और उसके द्वारा होने वाली जनप्रगति से मुझे अत्यन्त आनन्द हुआ और मेरे हृदय में साम्यवाद की नींव पर सामाजिक व सांस्कृतिक संगठन का संकल्प घर कर गया । एबिसीनिया पर होने वाले फासिस्ट अत्याचारों तथा जापान की चीन पर चढ़ दौड़ने की धृष्टता ने मेरी कल्पना को देश के प्राचीरों से निकाल कर मनुष्य मात्र के दुःख व अभिलाषाओं में साथ देने की प्रेरणा दी। और फिर दूसरे विश्व युद्ध के बाद मेरी मातृभूमि ने स्वतन्त्र होकर अपना सिर उठाया तो मेरा भी सिर ऊँचा हुआ। इतिहास की इन घटना-बहुल घड़ियों के कारण मृत्यु से जीवन की ओर, अन्धकार से आलोक की ओर निरन्तर प्रयाण करते हुए देश के एक कोने में पैदा हो कर बढ़ने वाले एक व्यक्ति के हृदय में उठने वाली समय की, क्षीण प्रतिध्वनि मेरी कविता में पायी जायेगी।

तुच्छ पदविन्यास लिये अधीर हो कर पहले पहल जब मैंने साहित्य-संसार में पदार्पण किया तब मेरे आराध्य देव थे महाकवि वल्लत्तोल् । “साहित्यमंजरी” के कल्पना-सुरभित तथा मधुर भावों से भरे गीतों ने मेरे हृदय को पहले ही मन्त्रमुग्ध कर लिया था । महाकवि उल्लुर के रचना-वैचित्र्य ने मुझे चकित कर दिया था। महाकवि कुमारन् आशान की हृदय की गहराई की भाव-व्यञ्जना करने वाली कविताओं से परमानन्द का अनुभव मुझे बाद में हुआ। वल्लत्तोल् के उपग्रह, ‘नालप्पाटन्’ तथा ‘केशवन् नायर’ बुध-शुक्र की तरह साहित्य क्षितिज पर चमक रहे थे।

मेरी कविता का रंग-प्रवेश हुआ ‘वल्लतोल्’ की पत्रिका ‘आत्मपोषिणी’ में। मेरी प्रथम रचना पढ़ कर महाकवि ने बड़े प्रेम के साथ एक पत्र लिखा और मुझसे शब्दालंकार की तड़क-भड़क से दूर रहने को कहा। मेरी दूसरी रचना पढ़ कर उन्होंने रचना तथा पदचयन सम्बन्धी कई विशेष बातें समझायीं। मेरी तीसरी रचना ‘घनमेघ की पाटी पर इन्द्र धनुष की रेखा खींचनेवाली प्रकृति बाला’ के सम्बन्ध में थी। उस को पढ़ कर महाकवि ने अभिनन्दन का पत्र भेजा। उससे मेरा साहस बढ़ा । किन्तु अल्प समय के अन्दर ही वल्लतोल ने ‘आत्मपोपिणी’ का सम्पादन छोड़ दिया । उस के बाद कविता रचना के रहस्यों को सीखने के लिए मैं और किसी के पास नहीं जा सका। जिन का सौहार्द-सुरभित सम्पर्क मेरे माहित्यजीवन में लाभदायक हुआ है उन में सुप्रसिद्ध समालोचक सी० एस० नायर तथा ख्यातिनामा कवि कल्लन्मारतोटि रामुण्णिमेनन् के नाम उल्लेखनीय है । रामुण्णिमेनन् मुझे अपना भाई समझते थे। ‘इन्द्रधनु’ तथा ‘वृन्दावन’ के ऊपर मेरे गीतों की प्रशंसात्मक आलोचना करके सरदार के० एम० पणिक्कर ने मेरा उत्साह बढ़ाया था। एक बार उन्होंने ‘एन्थालोजी आफ वर्ल्ड पोयट्री’ आदि पुस्तकें उपहारस्वरूप भेज दी थी। यही नहीं ‘अन्वेषणम्’ आदि कई एक कविताओं का अंगरेजी में अनुवाद करके उन्होंने मेरा सम्मान किया। मेरे साहित्य-जीवन के प्रारम्भ में ही सरदार के० एम० पणिक्कर और थोड़े समय बाद से प्रिंसिपल शङ्करन् नम्पियार ने मेरा जो उत्साह बढ़ाया है उस को मैं कृतज्ञता के साथ स्मरण करता हूँ।

मेरे विचार में, मेरी प्रारम्भिक कविताओं में जीवन का संचार किया है, प्रकृतिप्रेम तथा देश-भक्ति ने। प्रकृति के प्रति मेरा आकर्षण उस के साथ मेरा निकट सम्बन्ध, उस के साथ एकाकार हो जाने की अनुभूति तथा उस से प्राप्त प्रकृति के परे रहने वाला चेतना-शक्ति का आभास इन सब की पूँजी के बल पर ही साहित्य-लोक में प्रवेश करने तथा उस के एक कोने में घर करने में में समर्थ हुआ है। ‘सान्ध्य नक्षत्र’ जब हंसने लगा तब मेरा हृदय भी हँस उठा था। उसी समय मुझे अनुभव हुआ कि एक ही चेतना-शक्ति हम दोनों में विद्यमान है । इस अनुभूति से मुझे जो आनन्द हुआ उस का वर्णन करने की क्षमता ‘सान्ध्य नक्षत्र’ से ‘अन्तर्दाह’ तथा ‘विश्वदर्शन’ तक पहुंचने पर भी मेरी भाषा में नहीं है। तरंग-ताड़ित नदी में संवेदनाओं की उथल-पुचल मचाने वाले अपने हृदय का आभास देख पाना, सूर्यकान्ति के कम्पित अधरों में अपने भाव तरल अधरों को देख सकना, अरुणोदय की प्रतीक्षा में तपस्या करने वाले कमल के रूप में सत्य-सौन्दर्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करने वाले अपने जीवन को देख सकना-मेरे लिए परमानन्द का कारण है।

श्री ए० बालकृष्ण पिल्ले के सम्पादन में निकलने वाली ‘केसरी’ पत्रिका में मेरे कविता-संग्रह “सूर्यकान्ति” की समालोचना हुई थी। उस समय मैंने यह दिखाने की चेष्टा की थी कि उस समालोचना से मेरा कुछ बिगड़ा नहीं है । वास्तव में उस से मेरी कल्पना को बड़ी चोट लगी थी। रोमाण्टिक ढंग की कविताओं का सुन्दर संग्रह कह कर ‘सूर्यकान्ति’ की प्रशंसा करने के बाद केसरी ने ‘रोमाण्टिक’ कविता की खिल्ली उड़ायी थी। संक्षेप में समालोचक का कहना था कि जिस लेखनी को ‘रियलिज्म’ का नेतृत्व करना चाहिए वह पथ-भ्रष्ट हो कर भटक रही है । इस समालोचना से मुझे दुःख भी हुआ, क्षोभ भी। असमंजस में पड़ कर कई दिनों तक मैं हतोत्साह भी हुआ। मेरी कविताओं की वह प्रथम प्रतिकूल समालोचना थी। इस आघात के बाद ‘मेरी कविता से’ नामक रचना द्वारा मैने अपनी कविता को सान्त्वना देने की चेष्टा की। यह नहीं कह सकता उस से मेरी कविता को कोई सान्त्वना मिली। चाहे जो हो, कहानियों व उपन्यासों में पायी जाने वाली रियलिज्म कविता के लिए मुझे अच्छी नहीं जंची । प्रसंगवश, मैं यहाँ पर एक लेख का उल्लेख करना चाहता हूँ जो ‘जॉन आव लण्डन’ नामक साप्ताहिक में रिचर्ड चर्च ने लिखा है-‘कविता व यथार्थवाद पर उस प्रसिद्ध समालोचक के विचार, हमारे यथार्थ-मार्गगामी कवियों को, ध्यान से पढ़ने चाहिए।’

उसके बाद मुझे ऐसा मालूम होने लगा कि कल्पना में जीवित रहने वाली कविता को नयी अनुभूतियों से सजा कर नये परिवेशों से प्रेरणा ले कर लावण्य व चेतनापूर्ण रूप देना ही कवि कर्तव्य है। इस अभिज्ञता का प्रथम निदर्शन था मेरा ‘नाळे’ (आगामी कल) नामक गीत । उस की रचना शैली रोमाण्टिक कवि की थी तो उस का प्रतीक प्रदान किया था प्रकृति ने। परम्परा से प्राप्त अधिकार के बल पर मनमानी करने वाले मुट्ठी-भर लोगों के आतंक से छूट कर जनता को स्वतन्त्र वातावरण में रहने का अधिकार दिलाने वाले एक ‘नाळे’ की परिकल्पना थी उस में । ‘केसरी’ के ममत्वपूर्ण प्रहार ने मुझे दुर्बल नहीं किया, बल्कि-यद्यपि मैंने उन के कहे मार्ग का अवलम्बन नहीं किया-मुझ में आगे बढ़ने की शक्ति और स्फूर्ति उत्पन्न की। ( उस कविता का मेरी नौकरी पर जो परिणाम हुआ उस के बारे में कहने की आवश्यकता नहीं।)

उस कविता के बाद के तीन-चार वर्ष आलस्य तथा शारीरिक अस्वस्थता की पीड़ाओं में कटे । वह समय किसी प्रकार के रचनात्मक कार्य के लिए अनुकूल न था। एक एकांकी नाटक “इरुट्टिनमुन्यु”, “कालम्”, “नक्षत्रगीतम्” आदि गीत तथा कई एक लेख बस ये ही सब उस समय की रचनाएं है । दूसरे विश्व-युद्ध के पहले नयी आकांक्षा, देश-प्रेम का आदर्श, अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण तथा मनुष्य की प्रमुखता में विश्वास ले कर जब प्रगतिशील विचार-धारा सर्वत्र फैलने लगी तब मेरी कविता भी अपनी तन्द्रा से जाग उठी। “निमिषम्”, ‘कतिरुकळ’, ‘सन्धा’, ‘मुत्तुकल्’, ‘इतळुकछु’ आदि मेरे कविता संग्रहों में भारत की स्वतन्त्रता के पूर्व के धूप-छाया के प्रतिबिम्ब मिलेंगे। उस के बाद की अनुभूतियां संगृहीत हैं-‘वनगायकन्’, ‘पथिकन्टे पाटटु’, अन्तर्दाहम्’, ‘बेळ्ळिळ परक्कळुम्’ आदि में ।

कुछ लोगों का कहना है कि ‘सूर्यकान्ति’ के साथ मेरी कविता का विकास बन्द हो गया है तो कुछ लोग यह भी कहते हैं कि नहीं, सूर्यकान्ति के बाद मेरी कविता विकसित हुई है। किन्तु मेरे लिए मेरी सभी कविताएं मेरे आत्म-विकास का प्रतिबिम्ब है। “सूर्यकान्ति” मेरे श्मशान का फूल नहीं, वरन् तारुण्य के शिखर पर मधुर संवेदनाओं से प्रेरित हो कर खिला हुआ मेरा ही हृदय है। उसके बाद मैं वहाँ से भी ऊपर उठ गया हूँ। मेरी आँखों ने नये दृश्य देखे हैं, कानों ने नयी ध्वनियां सुनी हैं। मेरे हृदय ने अपनी व्यक्तिगत परिधि को पार कर विश्वमात्र के जन-जीवन के साथ एकाकार होने की चेष्टा की है । हो सकता है, ‘सूर्यकान्ति’ के बाद की मेरी कविताओं में आध्यात्मिक या लौकिक प्रेम-स्वप्नों का उन्माद छलकता हो। किन्तु मैं दावा करता हूँ कि उन कविताओं में एक अधीर हृदय का स्पन्दन है जो मनुष्य की महत्ता में गर्व करता है जिस में सुन्दर भविष्य के स्वप्नों का उत्साह है, जो मनुष्यता का मूल्य गिरता देख कर दुःखित है और जो सौन्दर्य-बोध को मनुष्य जीवन के लिए मृतसंजीवनी मन्त्र समझता है ।

[मूल : जी. शंकर कुरुप । हिन्दी अनुवाद-गोविन्द विद्यार्थी ]

Leave a Reply