भगवान ने हस्ताक्षर किये

भगवान ने हस्ताक्षर किये;
देखा कवि ने उसे,
होकर रस-विभोर।

विशाल आकाश है बना पृष्ठभूमि
शोभा दे रही हैं ऊँचे पर्वतों की श्रेणियाँ।
घने जंगलों की सीमाओं के बीच,
विराज रही हैं तुंगा जल सुन्दरी।
भगवान ने हस्ताक्षर किये
देखा कवि ने उसे,
होकर रस-विभोर।

नदी बह रही थी, निश्चल था वन;
बिखेर रहा था आकाश नीलमी मुस्कान,
निर्जन प्रदेश की नीरवता में
खगरव पुलकित हो उठा था।
सुनहली धूप में जगमगाती जल-धारा
शिलाओं के बीच तुतलाती धारा।
शोभित करते सुनहले रेतीले दोनों किनारे।
सिब्बलगुड्डे की नदी में नहा कर
कवि का मन जा ठहरा स्वर्ग में;
मधु-सौन्दर्य का मधुर जगत्
बन चला था मधु
हृदय जिह्वा के लिए!

दृश्य दिगन्त से एक साथ निकलकर
गिरि, वन के ऊपर के आकाश के पट पर
जब उड़ती आयीं बालकों की पंक्ति
लेखन रेखान्यास में
अवाङ्मय छंद और तुकबंदी।
सृष्टि की रचना
कौशल के पीछे
सौन्दर्य के पीछे
और जग के इस अनूठे विन्यास के पीछे
अपने होने के प्रमाण स्वरूप,
बगुलों की पंक्ति के रूप में
भगवान ने हस्ताक्षर किये;
देखा कवि ने उसे
होकर रस-विभोर।

कन्नड़ कविता हिन्दी में : कुपल्ली वेंकटप्पागौड़ा पुटप्पा (कुवेम्पु)
Kannada Poetry in Hindi : Kuppali Venkatappa Puttappa (Kuvempu)

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