बूंद ओस की

स्वर्ग की ओर खेलने शिकार, निकला मैं तड़के ही,
भूखे महाव्याघ्र जैसे, सौंदर्य-धेनु के हृदय का
खून चूसने की आतुरता से, पर्वतीय प्रदेश की उस
घाटी के हरियाली-भरे घास के मैदान में,
जहाँ थीं झाड़ियाँ! पिछली रात को हुई
वर्षा से भीगी धरती, भाद्रपद मास के प्रात:काल के
सूर्य की सुंदर मरीचियों में नहलाकर, तिनकों के
समूह की नोकों पर नाचनेवाली ओस की बूंद के
हजारों दीवटों से बन चली थी अतीव ही रमणीय!
लग रहा था ऐसे कि इंद्रधनुष को कूट-कूटकर,
उनमें चिनगारी लगाकर, मानों बिखेर दिया हो
इधर धरती पर! बहुसंख्यक पक्षियों के
कलरव ने मानों जोड़ दिया था उधर
धरती को गगन से! तैरते आनंद के सागर में
आत्मा कवि की इधर डूब चली थी, पिघल चली थी!
संपूर्ण संतृप्ति ने मानों जीव रूपी जिह्वा के ऊपर
उँडेल दिया था मधु को!

रुक जाओ यहाँ, कृपया रुक जाओ यहाँ!
काल एवं देश का हुआ है मेल ‘अब यहाँ’!
स्वर्ग ही बन चला है यह स्थल ‘अब यहाँ’!
इसी क्षण हुआ है यहाँ संगम गंगा-यमुना का
खड़े होकर यहाँ देखो तो उसे; उभर आयी उस
हरित धारा के प्रतीक उन तिनकों की
नोकों पर मणिदीप जैसे जल रहा है उधर,
लो उज्जवल प्रकाश के साथ बूंद ओस की
सौंदर्य की अधिदेवी के नथ का बूंद-मोती
इठला रहा है, बलखा रहा है, चमक रहा है।
पग आगे धरोगे तो मिलेगा तुम्हें ‘कुछ नहीं’;
पग पीछे हटाओगे तो मिलेगा तुम्हें ‘कुछ नहीं’;
बीत जाए यदि यह क्षण तो मिलेगा तुम्हें ‘कुछ नहीं’;
आ जाओगे एक क्षण पहले भी तो मिलेगा तुम्हें ‘कुछ नहीं’;
काल-देश के संगम के इस प्रयाग-तीर्थ में
यदि नहलाओगे नहीं, तो मिलेगा नहीं तुम को
स्वर्ग-सुख कभी इस हिममणि-रूपी तिलोत्तमा का।
यदि साकार रूप धरकर आएगी सुंदरता
धरती पर की समस्त सुंदरियों की, फिर भी
वह समरूप नहीं हो सकती हमारी
हिममणि-रूपी तिलोत्तमा के।………
छि: बस करो बातें वर्णन की । हो जाएगी अंधी
तुलना करने निकली आँख ही। चुपके से खड़े होकर
देखो उसे, और भूल जाओ अपने आपको, हटाते उधर
और कोई विचार।

कन्नड़ कविता हिन्दी में : कुपल्ली वेंकटप्पागौड़ा पुटप्पा (कुवेम्पु)
Kannada Poetry in Hindi : Kuppali Venkatappa Puttappa (Kuvempu)

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