वह पेड़ (आ मरम्)

वह पेड़ …
आज भी जब वह पेड़ दिखाई देता है
मेरे प्राणों में पुलक फूटने लगता है
पैर लड़खड़ाने लगते हैं
बरौनियाँ गीली हो जाती हैं
और व्याकुल मन स्पन्दित होने लगता है।
ओ मेरे मन !
जिसे आगे कभी उदित नहीं होना है
उस चन्द्रमा के लिए क्यों चौकड़ियाँ भरते हो ?
किन्तु, नहीं-तप्त प्राणों के लिए
लुप्त मधुर सुख की स्मृति की छाया भी
अत्यन्त आश्वासदायक हो सकती है।
पंख फड़फड़ाकर दिन-रैन के
कालविहंगिनी कितनी दूर चली गयी है !
कितने ही तारे टिमटिमा कर बुझ गये,
कितने ही सुमन खिल-खिलकर झर गये
कितनी ही मोहक सन्ध्याएँ अस्त हुई-
हाँ, सब कुछ किसी स्वप्न के भंवर में घूम रहा है।
किन्तु वह सन्ध्या-
जब मैं ने उन मधुर अधरों से
यह मधु स्पन्दी वाणी सुनी
“मैं अनुराग की दासी हूँ”-
वह कितनी भिन्न थी !
उस दिन के तारे कुछ और ही थे
उस दिन की सन्ध्या कुछ और ही थी
और, उस दिन का मन्द पवन भी भिन्न था !

सान्ध्य-सूर्य के चषक में
भरकर अरुणासव
पान कर रही थी सन्ध्यादेवी दिन के संग
मदारुण गुलाबी कपोल थे उस के।
रसिक पवन
चकित लतिकाओं के अंगों को
बारम्बार आलिंगन में भर रहा था,
यद्यपि वे करती थीं प्रतिरोध मर्मर स्वर में
सुरभि-मत्त मधुकर
प्रीति-संभार से मौन-मूक
अध-खिली चमेली को
उदार चुम्बन रस से
बना रहा था उन्मत्त !
नभ में दूर स्थित तारे
जता रहे थे भाव लोल लोचनों द्वारा,
उत्तर दे रही थीं
रम्य सुमनराजियाँ
सुरभिल निश्वासों के द्वारा,
कामुक व्योम
गमनोद्यत दिन-लक्ष्मी के
सौवर्ण कौशेय का अंचल पकड़कर
चूमता था उसे बारम्बार-
जाने ही नहीं देता था।

खड़ी थी वह
घुंघराली नील केशराशि का जूड़ा बाँधे
गुलाब-शोभित,
हिल्लोल मनोहर उरोजों पर डाले मसृण-साड़ी,
अंग-अंग में प्रस्फुटित
मोहक यौवन से उद्भासित तन,

स्निग्ध गीली पलकों से युक्त
प्रेम-वाचाल नील नयनांचला
मेरे युवा हृदय के सपनों की साकार
प्रतिमा बनी हुई,
आज भी मधुभाषिणी की उस
मुद्रा-भंगिमा की याद
बना देती है मेरे मन को उन्मत्त !

जब कोमल कामिनी ने
अपना पूर्ण सुभग जीवन
सानन्दवाष्प सौंपा मेरे हाथों में
तो मैंने अनुभव किया सगर्व,
मानो कोई अकिंचन
अकस्मात् बन गया हो राजाधिराज !

अब तो उस घड़ी के दुर्लभ सौन्दर्य का
केवल रोमन्थ करने के लिए ही मैं बच गया हूँ।
हाय, प्रेम की विजय-यात्रा को भी
रुक जाना पड़ता है श्मशान में
मृत्यु की साम्राज्य-सीमा श्मशान में पहुँचकर !
लुट गया लावण्य का वह साम्राज्य
और नष्ट हो गया मेरे स्वप्नों का स्वर्ग !

पल-भर में ही मिट जाता है इन्द्रधनुष,
मात्र दिन-भर में मुरझा जाता है सुमन;
अपने वक्षस्थल में प्रभात का चुम्बन पानेवाली हिमकणिका
मुस्कराने भी नहीं पाती है कि मिट जाती है
बिजली नष्ट हो जाती है उत्पन्न होते ही ;
क्षणिकता ही तो है धर्म लावण्य का!

हे अनुराग,
तुम हो स्वर्णिम गुलाब
झर जाते हैं जल्दी ही सुन्दर दल-
फिर काँटों से बेधते हो तुम हृदय-
तुम से मैं घृणा करता हूँ।

-१९३०

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