प्राक्कथन ओटक्कुषल् (बाँसुरी) : लक्ष्मीचन्द्र जैन

Prakkathan Otakkuzhal : Lakshmi Chandra Jain

प्राक्कथन

मलयालम की यह काव्यकृति ‘ओटक्कुष़ल्’ भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रवर्तित एक लाख रुपये राशि से पुरस्कृत हुई है और दिल्ली में 11 नवम्बर, 1966 को आयोजित पुरस्कार-समर्पण-समारोह के अवसर पर हिन्दी-अनुवाद के रूप में पाठकों के सामने आ रही है। इस काव्य-संग्रह का प्रकाशन भारतीय साहित्य के इतिहास की बड़ी घटना है। इस अवसर पर यदि भारतीय ज्ञानपीठ को विशेष गर्व और गौरव अनुभव हो, तो यह स्वाभाविक है।

इस घटना के कितने-कितने आयाम हैं। यह, कि समग्र भारतीय साहित्य को एक इकाई के रूप में देख कर उस मूल्यांकन का प्रयत्न देश में पहली बार हुआ है; कि एक निश्चित विधि-विधान के अन्तर्गत, भारतीय साहित्य की एक कृति को निर्धारित अवधि में प्रकाशित सर्जनात्मक साहित्य की श्रेष्ठ उपलब्धि घोषित कर देश का ध्यान उस कवि और उस कृति की ओर आकर्षित किया जा रहा है; कि, अपेक्षा है कि इस कृति का अनुवाद-प्रकाशन हिन्दी को वास्तविक अर्थ में देश की साहित्यिक उपलब्धियों के आदान-प्रदान का सार्थक माध्यम प्रमाणित करेगा; कि, इस प्रकाशन से यह प्रमाणित होगा कि दिल्ली में जनमा और बैठा हिन्दी भाषा-भाषी साहित्यकार (‘दिल्ली में’ इस लिए कि, यहाँ ही इस प्रकाशन का अनावरण पहली बार हो रहा है) मूल मलयालम की देवनागरी लिपि के माध्यम से पढ़ कर देखेगा और विमुग्ध होगा कि जिस अखिल भारतीय संस्कृति और सांस्कृतिक स्पन्दन की बात कही जा रही है, साहित्य के क्षेत्र में वह कोरी कल्पना नहीं है, ठोस यथार्थ है। क्योंकि भाषा, छन्द-विधान, भाव-निधि इतने जाने-पहचाने लगते हैं जैसे उसकी अपनी भाषा की श्रेष्ठ कृतियों की भावभूमि मलयालम के माध्यम से प्रस्तुत की जा रही हो—यद्यपि कहाँ दिल्ली, और कहाँ केरल।

कृतिकार, महाकवि शंकर कुरूप का नाम इन पंक्तियों में अभी तक लिया नहीं गया है, केरल और दिल्ली के हृदयों के इस सम-स्वरीय स्पन्दन से विधाता वे हैं। ओटक्कुष़ल् का शाब्दिक अर्थ मलयालम में, ‘बांस की नली’ है, हिन्दी में हम ने उसे बांसुरी कहा है, अर्थात् ‘वंशी’-बाँस की बनी। कवि का नाम ‘शंकर’ और कृति का नाम ‘वंशी’—जैसे देश का सारा दार्शनिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक चित्र-फलक इस प्रकाश-बिन्दु के आलोक में जगमगा उठा।

पुरस्कार के लिए इस कृति का वरण ‘सर्वश्रेष्ठ’ है के रूप में प्रकाशन अवधि की सीमाओं से बाधित है, यह बात ध्यान में रख लेना आवश्यक है। पुरस्कार-विधान के अन्तर्गत, 1965 के पुरस्कार के लिए वे ही कृतियाँ विचारणीय थीं जिन के लेख जीवित हों, जो ‘सर्जनात्मक साहित्य’ की कोटि में आती हों और जिन का प्रकाशन सन् 1920 से 1958 के बीच हुआ हो। कृति के वरण की पद्धति यह है कि भारतीय संविधान-विहित 14 भाषाओं के लिए एक-एक ‘भाषा परामर्श समिति’ है जो अपनी भाषा की एक कृति को ‘सर्वश्रेष्ठ’ के रूप में चुन कर, भाषा-वर्ग समितियों के विचारार्थ प्रस्तुत करती है। भाषा-वर्ग समितियों का गठन इस प्रकार होता है कि परस्पर सम्बद्ध क्षेत्रों की दो-दो या तीन-तीन भाषाओं का एक वर्ग बनाया जाता है, क्योंकि (अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त पड़ोस के भाषांचल की भाषा जानने वाले समीक्षक सुविधापूर्वक मिल जाते हैं) जो सम्बन्धित भाषा-परामर्श समितियों द्वारा पुरस्कृत दो या तीन कृतियों पर विचार करते हैं और उनमें से एक ‘श्रेष्ठ’ को चुन लेते हैं। इस प्रथम पुरस्कार के सन्दर्भ में ऐसी 5 वर्ग समितियाँ भी थीं जिन्होंने एक-एक कृति को चुना, और अन्तिम निर्णायक मंडल—‘प्रवर परिषद्— के विचारार्थ प्रस्तुत किया।

‘प्रवर परिषद्’ ने द्वि-भाषी साहित्यिक समीक्षकों से कृतियों का पारस्परिक मूल्यांकन करवाया, एक विशेष आधार पर; इनका पुनर्मूल्यांकन करवाया गया। हिन्दी अनुवाद भी सामने प्रस्तुत रहा, अन्तिम निर्णय से पहले सम्बन्धित भाषा समितियों के संयोजकों और कृतियों के हिन्दी अनुवादकों को आमन्त्रित कर के प्रवर परिषद ने उन से अनुशंसित कृतियों के सम्बन्ध में विचार विनिमय किया, प्रश्नोत्तर हुए, मूल कृतियों के चुने हुए अंशों के पाठ द्वारा यह जानने का प्रयत्न किया कि अनुवाद में मूल के छन्द, स्वर, लय की जो प्रतिध्वनियाँ नहीं आ पायीं वे क्या हैं—आदि, आदि। इस प्रकार जो कृतियाँ अन्तिम चरण में विचारणीय थीं, उनसे प्रवर परिषद् ने सर्व-सम्मति से महाकवि कुरूप की इस कृति ‘ओटक्कुष़ल्’ का वरण सर्वश्रेष्ठ के रूप में किया।

प्रत्येक सम्भव प्रयत्न किया गया कि पुस्तक का वरण सर्वथा निष्पक्ष और प्रामाणिक रहे। हमें प्रसन्नता है कि भारतीय ज्ञानपीठ और प्रवर परिषद् की निष्पक्षता और प्रामाणिकता के विषय में कहीं कोई सन्देह नहीं रहा। कृति के वरण के विषय में कहीं कोई मत-भेद हो सकता है, वह प्रत्येक पुरस्कार के सम्बन्ध में सदा रहा है।

ओटक्कुष़ल’ के हिन्दी अनुवाद के सम्बन्ध में दो शब्द कह देना आवश्यक है। अनुवाद का प्रमुख लक्ष्य यह था कि मूल का भाव यथा-सम्भव अक्षुण्ण रूप से आ जाये, ताकि, कवि के शब्दों में, ‘‘रिद्म’ (लय) की अपेक्षा ‘कॉण्टेण्ट’ (विषय-बोध, भाव-बोध) पर ध्यान दिया जाये।’’

ज्ञानपीठ श्री पी.एन. भट्टतिरि, सह-सम्पादक ‘भारतवाणी, श्री जी.नारायण पिल्लै, हिन्दी विभाग, विश्वविद्यालय केन्द्र, एणार्कुलम, श्री के रविवर्मा, सम्पादक ‘युग प्रभात’ और श्री इलियटम् के प्रति आभारी है कि उनके द्वारा प्रस्तुत अनुवाद के प्रारूप को आधार बनाकर रूपान्तर प्रस्तुत किया जा सका है। श्री भट्टरि ने अपने अनुवाद में हिन्दी की छन्द और लय ध्वनि देने का प्रयत्न किया। श्री.जी नारायण पिल्लै की लगन, उनकी क्षमता और श्रम बहुत सहायक रहे। वह दो बार कलकत्ता आये, कुछ दिन रहे और रूपान्तरण के लिए मूल शब्दों और भावों का स्पष्टीकरण किया। संग्रह की एक कविता ‘वन्दनम् परयुक’ का अनुवाद, ‘शतशः धन्यवाद’ श्री दिनकर ने रेडियो के दिल्ली केन्द्र द्वारा आयोजित सर्वभाषा आन्दोलन में प्रस्तुत किया था। उसे साभार सम्मिलित किया गया है। एक समर्थ कवि द्वारा प्रस्तुत अनुवाद को सम्मिलित करने का एक विशेष प्रयोजन यह भी था कि कवि की एक कविता का छन्दबद्ध प्रवाह नमूने के रूप में सामने आये और कवि की अन्य कृतियों के अनुवाद के लिए प्रेरणा मिले।

‘ओटक्कुष़ल्’ में संग्रहीत कविताओं का चयन कवि ने अपनी 1950 तक की रचित कविताओं में से ही किया था। इधर के 15 वर्षों में कवि की प्रतिभा ने कौन सी सामर्थ्य और कौन से आयाम प्राप्त किए हैं, जब तक वह सामने न आए, कवि कुरू के कृतित्व का ठीक-ठीक मूल्यांकन नहीं हो सकता। भारतीय ज्ञानपीठ ने ‘ओटक्कुष़ल्’ के प्रकाशन के साथ-साथ कवि की चुनी हुई परवर्ती दस कविताओं का एक दूसरा संकलन, उनकी कविता के आधार पर ‘एक और नचिकेता’ शीर्षक से प्रकाशित किया है जो इसी प्रथम पुरस्कार-समर्पण-समारोह के अवसर पर पुस्तकों को भेंट किया जा रहा है।
कवि कुरूप ने अपने काव्य-विकास के सम्बन्ध में जो वक्तव्य ‘ओटक्कुष़ल्’ की भूमिका के रूप में तैयार किया था उस का अनुवाद सम्मिलित है। हाँ, श्री गुप्तन नायर की विस्तृत, भावपूर्ण भूमिका का अनुवाद सम्मिलित नहीं किया गया है, विशेषकर इस लिए कि हिन्दी के पाठक और समीक्षक कृति का रसग्रहण और मूल्यांकन स्वयं करें।
महाकवि और उनकी कविता के सम्बन्ध में विशेष कुछ न कह कर यहाँ हम उस ‘प्रशस्ति’ को उद्धरित कर रहे हैं जो कवि के सम्मान में समर्पित है

‘‘भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रवर्तित एक लाख रुपये की राशि का यह साहित्यिक पुरस्कार श्री जी. शंकर कुरूप को उनके मलयालम काव्य-संग्रह ‘ओटक्कुष़ल्’ के लिए समर्पित है, जिसे पुरस्कार विधान के अन्तर्गत गठित प्रवर परिषद् ने सन् 1920 से 1958 के बीच प्रकाशित भारतीय भाषाओं के सर्जनात्मक साहित्य में विधिवत् सर्वश्रेष्ठ निर्णीत और घोषित किया है।
‘ओटक्कुष़ल्’ का वरण यद्यपि सन् 1965 के लिए हुआ है, किन्तु इस का प्रकाशन वर्ष 1950 है। इस दृष्टि से यह कृति कवि के न केवल 1950 तक के सर्वश्रेष्ठ कृतित्व का प्रतिनिधित्व करती है, अपितु उनके अगले 15 वर्षों तक के अधिक समर्थ कृतित्व का पूर्व परिचय देती है। ‘ओटक्कुष़ल्’ की कविताओं में भारतीय अद्वैत भावना का साक्ष्य है जिसे कवि ने परम्परागत रहस्यवादी मान्यता के अंगीकरण द्वारा मान्य नहीं, प्रकृति के नानारूपों में प्रतिबिम्बित आत्म-छवि का वास्तविक अनुभूति द्वारा प्राप्त किया है। चराचर के साथ तादात्मय भाव की इस प्रतीति के कारण कवि कुरूप के रूमानी गीत-काव्य में भी एक आध्यात्मिक और नैतिक उदात्त स्वर है।

‘‘कवि की काव्य चेतना ने ऐतिहासिक तथा वैज्ञानिक युगबोध के प्रति सजग भाव रखा है और उत्तरोत्तर विकास पाया है। इस विकास-यात्रा में प्रकृति-प्रेम का स्थान यथार्थ ने, समाजवादी राष्ट्रीय चेतना का स्थान अन्तर्राष्ट्रीय मानवता ने ले लिया और इन सब की परिणति आध्यात्मिक विश्वचेतना में हुई जहाँ मानव विराट् विश्व की समष्टि से एकतान है; जहां मृत्यु भी विकास का चरण होने के कारण वरेण्य है।

‘‘कुरूप बिम्बों और प्रतीकों के कवि हैं। उन्होंने परम्परागत छन्द-विधान और संस्कृति-निष्ठ भाषा को अपनाया, परिमार्जित किया और अपने चिन्तन तथा काव्य-प्रतिबिम्बों के अनुरूप उन्हें अभिव्यक्ति की नयी सामर्थ्य से पुष्ट किया। इसीलिए कवि का कृतित्व कथ्य में भी शैली-शिल्प में भी मलयालम साहित्य की विशिष्ट उपलब्धि के रूप में ही नहीं भारतीय साहित्य की विशिष्ट उपलब्धि के रूप में ही नहीं, भारतीय साहित्य की एक उपलब्धि के रूप में भी सहज ग्राह्य है।
कवि दीर्घजीवी हों। शुभं भूयात् !’’

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