प्रभात-समीर (प्रभातवातम्)

जय हो तुम्हारी, हे प्रभात-पवन !
सफल हों तुम्हारे महान् यत्न ;
तुम आ रहे हो देवताओं के देश से
स्वर्ग का सन्देश पृथ्वी को देने के लिए।

उदार-हृदया प्रभातलक्ष्मी
अपनी पल्लव-हस्तांगुलियों को उठाकर
तुम्हारी आरब्ध यात्रा को विजयोपलब्धि के लिए
विकारमूक होकर आशीर्वाद दे रही है ।

तारे जो तम के पहरेदार हैं,
देख रहे हैं चौंक-चौंककर तुम्हारी ओर,
हे प्रकाश के अग्रदूत!
तुम्हारे प्रभाव से दिखायी देते है वे कैसे पाण्डुवर्ण !

मन्दगति से चलनेवाले महात्मन् !
पेड़-पादप सुरभिल गुलाब जलकण छिड़क रहे हैं।
सजग लतिकावाला कदम्ब
पराग-सिन्दूर लेप रहा है।

हे महासत्त्व !
रास्ता रोककर खड़े रहनेवाले गिरि-निकरों को
तुम अकेले ही हिलाकर रख देते हो,
किन्तु चूम-चूमकर दुलारते हो
नन्हे-नन्हे नवल तृणांकुर को।

दिशाओं के हर्षारुण मनहर मुख
तुम्हारी ओर घूम गये हैं,
पत्तों के कम्पित अधरों पर
छा गया है तुम्हारा पुण्यनाम ।

अविचल रहनेवाले ये हरे-भरे पर्वत
पुलकित हो विस्मय से विस्फारित गुहा-मुख,
निहारते रहते हैं तुम्हारी गति
हे विश्व के एकमात्र विस्मायक !

कहते हैं, सुखपान-मत्त जागरण-विरोधी
कि तुम पागल हो-
किन्तु हे पुलकप्रद,
उन की इस अज्ञता पर द्रवित होकर
तुम उसाँसें भर लेते हो।

तुम्हीं हो
विगत काल के जीर्ण-मलिन धरातल को
नयी द्युति से जगमगानेवाली
मूल प्रकृति के मन में अंकुरित
अप्रतिरोध्य नव-संकल्प!

जानता है चराचर जगत्
तुम्हारी चतुर सुकुमार भाषा ;
अन्यथा,
आसेतु हिमाचल
ऐसा स्पन्दन कैसे आविर्भूत होता?

हट गया है वह अन्धकार
जिस ने भर दिया आलस्य अपने इन्द्रजाल से यहाँ,
सुनहले नवीन प्रकाश को
फिर से आलिंगन कर रहा है
यह पुण्यपूर्ण पुरातन देश ।

जान गये हैं तुम्हारे सन्देश को
ये शैल-शृंखलाएँ और यह तरंगित विपुल पारावार ।
लो, पहाड़ों की पादप-पंक्तियाँ
नृत्य कर रही हैं,
और सागर का उरस्थल भी
उच्छलित और तरंगित हो रहा है ।

मेरे देश के सुमन
समर्पित कर रहे हैं आप को अपना जीवन,
उन की मदिर गन्ध बना रही है उन्मत्त
आस-पास बहनेवाली सरिताओं को।

हे चैतन्यदायक महात्मन्,
गूंज रही है तुम्हारी शक्तिध्वनि वेणुवन में !
प्रेम-मग्न मन्दस्मित के साथ
खड़ी हैं चारों दिशाएँ हाथों में हाथ डालकर ।

ऊपर मंडरा रही है
श्वेत-लाल-हरी मेघपताका,
हे उन्मेष-दायक!
मेरी जन्मभूमि जाग उठे
और खड़ी रहे सदा इसी झण्डे की मंगलछाया में !

-१९२८

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