पेड़ की छाया

लो फिर! उस पेड़ की छाया!
रोज की तरह पड़ी मर रही है वहाँ!
इस नियम का शासन मुझे पीड़ित कर रहा है
पूर्वजन्म के महा अभिशाप के रूप में,
नियमों को निगल कर, पचाकर, करने उल्लंघन उनका
व्याकुलता से प्रतीक्षारत है मेरा मन। –
उस पेड़ की छाया,
स्याही फेंकी गई हो मानो हरे मैदान पर
लम्बा तान कर लेट गई है अपशकुन के रूप में।
मन को आलोडित कर रही है उसकी मुग्ध मौन की वाणी
पहुँचाते मेरे हृदय को किसी भूले हुए
स्वातंत्र्य का संदेश। पड़ी हुई है
मैदान में विक्रीत दास जैसे, छुटकारा
न पाते हुए, चाहने पर भी! हर दिन देख रहा हूँ।
हर दिन सुबह-दिन न गिनते हुए, आकाश में
रवि जब जब चमकता है, पेड़ के पैरों तले
गिरकर ऊबे जाकर मरती रही है। हे शिव,
एक क्षण के लिए ही सही, वैविध्य के लिए ही सही
धूप और पेड़ होने पर भी, क्यों हो छाया अनिवार्य रूप से?

जहाँ भी देखो, वहाँ हैं सब दास ही! हे भगवान्!
ईश एक भी नहीं देख पाता! आग के लिए है सदा
चमकने-दहकने की दासता; हवा के लिए है सदा
बहने-चलने की दासता; रुके पानी के लिए है सदा
किनारे की वस्तुओं को प्रतिबिम्बित करने की दासता!
दासता का बना है आलय यह महाविश्व! सब आ चुके हैं दासता के
वज्रबंधन में यहाँ! एक दिन के लिए ही सही,
पानी जले नहीं क्योंकर? एक बार ही सही,
पत्थर पंछी जैसे उड़ पाये नहीं क्योंकर?
एक क्षण के लिए ही सही, दास्यनियम मिटकर
स्वातंत्र्य, स्वच्छन्दता, पागलपन के लिए मिला क्या न आकार?
सब चाहे मिट जाए आज ही!
सब चाहे मिट जाए आज ही!
चाहिए मुझे वह स्वातंत्र्य-श्री मात्र ही!

कन्नड़ कविता हिन्दी में : कुपल्ली वेंकटप्पागौड़ा पुटप्पा (कुवेम्पु)
Kannada Poetry in Hindi : Kuppali Venkatappa Puttappa (Kuvempu)

Leave a Reply