पुष्पगीत ! दो (पुष्पगीतम् 2)


हे शाश्वत, जगत्प्राण !
जब तुम शान्त निश्चल होकर
खड़े थे आधी रात में, और
यद्यपि थे विश्व-भर में व्याप्त
मैंने समझा यही कि तुम रूपहीन का
अस्तित्व ही नहीं है।
क्षमा करो इस अन्ध चपलता को
मैं अज्ञ वन-पुष्प ही तो ठहरा !

हाय तुम्हारे चरणों की अर्चना के लिए
मेरी एक पंखुरी तक न झरी,
मेरा जो स्वल्प परिमल है
वह भी मैंने समर्पित नहीं किया।
मैने नहीं किया अपने पराग का आलेपन
तुम्हारे सुन्दर वक्ष पर-
जब तुम स्वयं खड़े थे निःशब्द
मुझे स्नेह-पूर्वक वक्ष से चिपटाये हुए।

किन्तु
हे अनादि,
लोकालम्बन परिणामहीन पवमान !
यह क्षुद्र पुष्प क्या जानता है
तुम्हारी महिमा?
क्या सीपी नाप सकती है
महासागर को?

नहीं चिन्तन किया कभी
उन तारों के मौन गीत-तत्त्वों
का जो दिखाते हैं रास्ता रात में भी,
नहीं किया तर्पण तुम्हारा कभी
अपने अन्तरंग के मधु से,
तुम्हारे सान्निध्य को भी भूलकर
हो गया था निद्रा-निलीन
यह क्षुद्र वन-पुष्प !


शायद ऐसा सोचकर कि
हम तुम्हें भूल न जायें
अत्युग्र घोष के साथ
विस्मयकारी ढंग से रूप बदलकर
वर्षा-मेघों का जटा-जूट प्रकम्पित कर
अपने गर्जन-तर्जन से
बार-बार समूचे संसार को चौंकाते हुए,
बीच-बीच में खींच लेते हो तुम अपनी नंगी तलवार
जो आकाश को दमका देती है,
भयानक रौद्र रूप धारण कर
रच डाला है सब कहीं ताण्डव नृत्य तुमने ।
तुम्हारे इस कृत्रिम क्रोध के कारण
जहाँ गाज गिरी
वहीं गिरिप्रान्त दग्ध हो गया,
भय-विकम्पित मुग्ध तारकों ने
आँखें मूंद लीं,
समुद्र ने करुण स्वर में रुदन किया ।

जब फल सम्पदाएँ सारी नष्ट हो गयीं
तो भय-कम्पित पादपों ने
पात-पात आँसू बहा दिये।
दुःख ही तो है असली आचार्य !
तब हमें अनुभव हो गया कि
आप जो जीवों के आधार हैं
वास्तव में विश्वव्यापी हैं।

तब परिभ्रान्त सागरान्तर में
अगम संकुल उत्तुंग कुल-पर्वत में
तुम्हारे दुरतिक्रम प्रभाव का स्तुतिगीत
सुनाई पड़ा उच्च स्वर में-
हे विश्वात्मन् जय हो तुम्हारी !


उपशम हो गया तुम्हारा क्रोध,
मिट गया सारा अन्धकार,
प्रदीप्त हुआ फिर से
पूर्व दिशा का छोर।
पुनः प्राप्त कर अपनी आत्म-शक्ति
आनन्द लास्य करने लगा सागर,
पुलकित हो उठा पर्वत !

हे सौम्य !
मिटने लगी कालिमा
दिग्दिगन्त के मुख पर से,
चमक उठी स्मित-रेखा
तुम्हारी करुणा की कोर से
विमल, रम्य ।

मेरे मूक अधर कम्पित होने लगे
तुम्हारी स्तुति के लिए
अत्यन्त वात्सल्य से पूरित
आँक दिया तुमने अपना चुम्बन
उन पर।
प्रेमाकुल होकर
तुमने अपने कोमल हाथों से
इस पुष्प को उठाया, और
बारम्बार अपनी छाती से लगाया।
यद्यपि सारहीन है मेरा जीवन
तथापि हे पुण्योदार,
तुम्हारे स्पर्शों ने इसे बना दिया नित्यपूत ।

मेरा प्रत्येक कम्पन है
तुम्हारी इच्छा पर आधारित;
यही है मेरी कामना कि
इस मिट्टी में मिट्टी बन जाने से पहले
अपने पराग से
कर सकूँ तुम्हारा अंग-लेपन,
यह मेरा अत्यल्प सौरभ
यदि तुम्हें आमोदित कर सके
तो हो जाऊँ मैं कृतार्थ,
मैं फिर भी खिलूँ किसी जंगल में
तुम्हारे ही परितोष के लिए
-यही है मेरी कामना !

-१९२६

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