पुष्पगीत ! एक (पुष्पगीतम् 1)


श्याम सुन्दर,
अनादि अनन्त,
हे आकाश!
तेरे विश्वव्यापी हृदय में से चू पड़ी है
स्नेह की एक शीतल ओस-बूंद
जिस ने बना दिया है मुझ पुष्प को
पुलकित और पूर्ण-काम !
जो हाथ सागर को भरते हैं
वे भला इस तुच्छ सीपी को
नितान्त भरा-पूरा बनाने में
क्यों कोई अभाव अनुभव करेंगे ?
किन्तु, मेरा यह मृदुल दल-सम्पुट
तेरे दिये गन्ध आमोद के भार से
पहले से ही विनत है,
फिर, भगवन् ! आप की कृपा का यह चंचल-शीकर
मैं किस प्रकार वहन करूं?

समेट लो इस बूंद को दया करके
हे तेजोराशि!
यह कहीं गिर न जाये सूखी धरती पर
मेरे दौर्बल्य के कारण।
अपनी अंग-श्री द्वारा तू ने
हरा-भरा बनाया है इस टीले की तराई को,
मैंने यहाँ जीवन-भर लूटा है स्वातन्त्र्य-सुख
तेरी प्रेरणा से मैंने सदा ही भोगा है विकास का उल्लास
तू ने मुझे बनाया है नितान्त धन्य!


जो पहनते हैं
मन्दार वृक्षों के पल्लवों का
स्वर्णजटित रेशमी छत्र-
उन देवताओं के उद्यान में,
रत्न-शैल के प्रान्तर प्रदेश में,
नहीं खिलना चाहता हूँ मैं !
मैं चाहता हूँ खिलना
उस भूमि में जहाँ
तेज गर्मी की आँच से झुलस गयी है
जो दूब,
उसे अनंद प्रदान करूँ, यही है मेरी अभिलाषा ।

मेरी स्वतन्त्रता के स्वच्छ मुख पर
स्वर्ग के उन महान् पेड़ों की छाया की कालिमा न पड़े,
यही है मेरी प्रार्थना !

परतन्त्रता के रत्नों से जगमगाते महल की अपेक्षा
मेरे लिए सुखकर और सन्तोषदायिनी है
स्वतन्त्रता की घास में उगी-बनी
मेरी छोटी-सी मलिन झोंपड़ी!
मुझे डर है कहीं इन कल्पवृक्षों की
छिछोरी छाया
तुम्हारे प्रियदर्शी मुख को
मेरी आँखों से ओझल न कर दे !
कहीं ऐसा तो नहीं कि
स्वर्ण शैलों की पीली कान्ति की झिलमिलाहट में
तुम्हारे कोमल अंगों की नाजुक नीलिमा तिरोहित हो जाये ?
कहीं ऐसा तो नहीं कि
भौंरों की लोभग्रस्त चाटुकारिता के गीतों की गुनगुनाहट में
मैं तुम्हारे मंगलमय मौन-गान को भुला बैठूं ?


ऊँचा है रत्नगिरि का शिखर,
उस से ऊँचे जगमगाता है भोर का तारा ।
प्रभात के उस तारे की तरह ही इस वनपुष्प को भी
सदा सुन्दर और समुत्फुल्ल बनाते हो तुम,
धन्य है तुम्हारी समदर्शिता!

जब अपनी लाल-शोणित जिह्वा से चाट-चाटकर
घने अन्धकार को भी तुम लील जाते हो
ताकि संसार का परित्राण हो तमान्धकार से
तो बाल-पवन पास आकर मुझे झकझोरता है,
मैं चौंककर एक अनोखे विस्मय के साथ जाग जाता हूँ।

मेरी कामना है, मैं खड़ा होऊँ
नव-चेतना से भरी इस भूमि के आनन्द में
मात्र सहभागी बनने के लिए, बिना किसी अन्य आशा के।
भले ही न फैले मेरी सुरभि,
न हो मेरे भाग्य में नागरिकों की दृष्टि का आतिथ्य-
स्नेहसिक्त, आदर-भरा!

मैं विनम्र और लज्जाशील
कानन-पुष्प
सदा तुम्हारे पावन प्रवर्द्धित लावण्य को भरपूर भोगते हुए,
प्रेम प्रमुदित और निःशोक झर जाऊँ
मातृभूमि के पवित्र वक्ष पर-
यही है मेरी कामना !

-१९२६

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