पक्षिकाशी

यहाँ है नहीं तेरा प्रवेश, हे व्याध;
यह है पक्षिकाशी।
देवनदी में, ईश कृपा में
भावतरुवासी
प्राणपक्षी संकुल को मिलता है संरक्षण यहाँ;
है यह नित्य अविनाशी
देख शक्ति को मिली है रक्षा यहाँ से।
अग्नि की जलराशि की।

मारनेवाले तीर, कमान, तरकस सबको
छोड़ वहीं, आ!
बसे सब अहंकार की, तिरछे तंत्रों की
सब कुछ छोड़ वहीं, आ।

नहाकर आ, हाथ धोकर आ,
अहंकार छोड़कर आ,
इक्षुमधुर-सी है मोक्षपक्षी की चहक
जब बहेगी रग-रग में
खुशी से झूम उठेगा, आ।

कन्नड़ कविता हिन्दी में : कुपल्ली वेंकटप्पागौड़ा पुटप्पा (कुवेम्पु)
Kannada Poetry in Hindi : Kuppali Venkatappa Puttappa (Kuvempu)

This Post Has One Comment

Leave a Reply