छाया (निष़ळ्)

मैं हैं एक अर्थहीन छाया-रूप,
मेरा मलिन जीवन केवल अस्थिर स्वप्न है,
जग की मृग-मरीचिका में आनन्द और उल्लास से वंचित
किसी स्वप्न में डूबता-उतराता सरकता हुआ चला जा रहा हूँ मैं ।

निदाघ की कड़ी धूप में
जब मल्लिका म्लान हो जाती है
तो मैं उस की सहायतार्थ पहुँच जाता हूँ;
मेरे शीतल शरीर से लिपटकर
मुस्कान से मनोहर मुख झुकाकर
सनिश्वास मूक खड़ी रहती है
वह लज्जा-मधुर लता-वधू ।

मैं भींच देता हूँ नयन दिन के
जो परिहास-क्रीड़ा में ठहाका मारकर हँस उठता है,
और चूमता हूँ निद्रा-निमग्न कृषिस्थली के कपोल,
और आनन्दित होता हूँ
ईख के प्ररोह-पुलकों को देख-देखकर ।
कैसी-कैसी दशा बदलती रहती है मेरी!
कभी मैं कड़ी धूप से तपती तराई में रहता हूँ,
कभी अनजाने शीतल शैल शिखर पर चढ़ता हूँ-
निश्चय ही कोई महान् अदृश्य शक्ति
चला रही है मुझे।

कहाँ है मेरा गन्तव्य स्थान ?
किस वस्तु को प्राप्त करने के लिए भटकता रहा हूँ मैं ?
मुझ में और इन पहाड़ों में कितना अन्तर?
पर्वत है अचल मनोहर,
किन्तु मैं जनमा हूँ चपल विरूप ।

नहीं,
महाशैल और महासागर भी मिटेंगे एक दिन,
कोई भी यहाँ न रहेगा तद्वत्-
यही तो है सृष्टि की स्वाभाविक गति ।
सब के भीतर है किन्तु एक परम सुन्दर शाश्वत सत्य,
ये जो दीखते हैं, उसी के बाहरी रूप हैं ।

हाय ! सन्ध्या आ पहुँची,
विदा, अयि मनोहारिणी धरिणी,
मैं क्षण-भर में तम में विलीन हो जाऊँगा ।
हे मल्लिके ! पुष्प-अश्रुकण न झरने दो,
इस तरह न खोने दो मुझे, रहे-सहे धैर्य को ।

-१९२८

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