कोयल (कुयिळ्)

“जीवन तो नहीं है उँगली की पोर जितना
किन्तु कर्तव्य है विशाल व्योम-सा;
तो फिर पिकवर,
क्यों खोये दे रहे हो दुर्लभ वसन्त को
व्यर्थ ही गा-गाकर?”

पथिक ने अपना प्रश्न जारी रखा-
“इस विशाल उपवन में खड़े होकर
चपल तरुगण
जब जीवन-संग्राम की भेरियाँ बजा रहे हैं
तो तुम निरे आलसी के गीतों का मूल्य ही क्या है ?

“हे परभृत,
परिहासमय तुम्हारा जीवन है ।
स्वर्णमाल-विभूषित कणिकारों की ओर से
आ रही है अतृप्ति की आवाज,
अलंभाव बाधक है श्रेय का
किन्तु
चिर-अतृप्ति द्वार है
उन्नति के सौध का।
यह आकाशलक्ष्मी
आदित्य मण्डल के चरखे पर काते जा रही है शुभ्र सूत
बिना किसी आलस्य के,
और यह दिन
उस के निकट रखे जा रहा है
श्वेत नीरद की नयी-नयी पूनियाँ
धुन-धुनकर।
दिन लम्बा नहीं है
और उजाले को
लूट ले जानेवाली रात भी दूर नहीं ;
हमेशा के लिए सो जाना पड़ेगा,
उस से पहले ही दोनों हाथों लूट लो
जीवन की मदिरा,
व्यर्थ न करो उस की एक कणिका भी,
हो जायें तुम्हारे कपोल नशे से लाल-
यह समीर
जो गुलाब के अधरों का चुम्बन ले रहा है,
निश्वास भरकर यही तो कह रहा है !
सागर
अपने साम्राज्य का विस्तार करना चाहता है
और धरातल
पराधीन न होने का यत्न करता है।”

कोयल बोली-
“भद्र, कल्याण हो तुम्हारा,
पुण्य-पथ द्वारा तुम अपने लक्ष्य को प्राप्त करो!
स्वातन्त्र्य की श्री-देवी का पावन निवास-मन्दिर है
विश्व-लावण्य के नीलोत्पल दलों में,
इस नभोमण्डल को देखकर
भूल जाता हूँ मैं स्वयं को,
मालूम नहीं
मेरा गीत सार्थक है या निरर्थक ।
मुझ में न तो फूलों की सी सुकोमलता है
न गीध की सी दूर दृष्टि;
मेरी तो कामना यही है-
पेड़ की इस डाली में पड़ा रहूँ कहीं शोक-मुक्त
आकाश की अनश्वर सुन्दरता का गीत गाता हुआ !
जीवन-संग्राम में निरन्तर पराजित होनेवाले
विदीर्ण-हृदय बन्धुओं में अवश्य होंगे ऐसे कोई,
जिन्हें मेरा गाना आनन्द-दान करेगा;
मैं तो क्षुद्र पक्षी हूँ,
यही सही !”

-१९२९

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