कोंपल

ओह! रुककर देखो तो यहाँ
इस वृक्ष की देहश्री में इधर,
खिल रहा है स्वर्ग आप ही।
उर्वशी तिलोत्तमा आदि अप्सराएँ
नाच रही हैं यहाँ इस वृक्ष की
कोंपलों की इस इंद्र सभा में।
पाँव हैं जकड़े हुए यहाँ भूलकर
चलना अपना, स्वयं पेड़ बनकर;
अचंभे से देख रहा हूँ मैं उसको।
हाय! प्रार्थना है यह तुमसे मेरी,
जरा रुककर देखो तो यहाँ
लगता है कि फव्वारा ही चेतना का
फूट निकला है इस वृक्ष से।

लगता ऐसा है यहाँ
हुआ संमेल उन सारी सुंदरियों के
सुंदर अधरों का, जिन्हें देखा नहीं
मैंने आज तक! लगता है ऐसा
मानों भू-माता ने भेज दिया हो यहाँ की
शिशु-प्रदर्शनी में अपने सारे बच्चे।
लहलहाती इन कोंपलों की समृद्धि से
उद्घोषित कर रही हैं यह दिव्य कलासुंदरी:
मृण्मय हृदय में है छिपा चिन्मय,
जड़ के ऊपर होती है विजय चेतना की सदा:
शरद् उपरान्त आती है अवश्य बारी वसंत की;
बढ़ना है तुम्हें आगे आगे, बिना खोये आस्था।

आह! रुककर देखो तो यहाँ।
सैकड़ों ऋषियों के उपदेशों का सार है यहाँ।
सैकड़ों वैरागियों का परिवार है यहाँ।
बुद्धि से परे सिद्धि होती है भावगोचर यहाँ।
व्यक्तित्व ही ज्वाला बन जलता है यहाँ।
क्यों करें यात्रा सैकड़ों मीलों दूर काशी की?
आ जाओ यहाँ, हे यात्री, यह है शस्य-काशी!
रसतीर्थ में नहलाया है जिसने भय, क्यों हो
भय उसको भव की बाधा का? यह पृथ्वी ही
बनी है पुण्यमय आलय और स्वर्ग है बना
एकदम परदेशी ही!

कन्नड़ कविता हिन्दी में : कुपल्ली वेंकटप्पागौड़ा पुटप्पा (कुवेम्पु)
Kannada Poetry in Hindi : Kuppali Venkatappa Puttappa (Kuvempu)

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