कवि शैल

मित्रों, वाणी यहाँ बनती है अछूत, शान्त रहिए।
मौन ही महान है यहाँ, इस शाम में
इस कविशैल में आच्छादित शाम के अन्धेरे में
ध्यानमग्न योगी बना है महा सह्यगिरि।
बादलों की लहरों में मुस्कुराता दूज का चाँद।
गगनदेवी के द्वारा पूजा में सजाये गये
दीवट के रूप की सोने की नैया जैसे
शोभित होता आँखों से ओझल होता,
तैर रहा था इठलाता बलखाता।
शिव-शिवानी की तरह
धूप-छाँव का सरस-संलाप दृष्टिगत था
तरु तल के धरातल में।
शहर, बाजार, घर और हर जगह
होता रहता है हमेशा गपशप
और आप लोगों का; वह शोरगुल
यहाँ कहाँ? प्रकृति देवी
के इस सुन्दर मन्दिर में,
आनन्द ही पूजा है; मौन ही महास्तोत्र है।

कन्नड़ कविता हिन्दी में : कुपल्ली वेंकटप्पागौड़ा पुटप्पा (कुवेम्पु)
Kannada Poetry in Hindi : Kuppali Venkatappa Puttappa (Kuvempu)

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