उषा

पूरब की दिशा में खेलती-खेलती,
इठलाती बलखाती, उभर आती है!
ऊपर उठती, धीरे धीरे, देख,
उषा उभर आती है!

अंधी रात का काला बिछौना खोलती है धरती धीरे-धीरे,
नये काननों का हरे परिधान पहने सोह रहे हैं हिममणिगण,
ठंडी हवा विलसती है कोंपलों पर थिरक थिरक कर पग धरती हुई,
नाचती है मधुपान में मत्त अपने को भूल कामुक व्यक्ति जैसे!

आसमान में अचल छोटी छोटी बदलियों के झुंड पर
अनुराग से नव मोह की होली के रंग बिखेरती
खोलते अंधियारी की पलकों को, बरसाती अरुण राग,
चलती है सींचते रस चेतना के, सुंदरता के नवजीवन का रस सींचती

मधुर कंठ से कूजता है शुक-पिक-पक्षिगण सारा!
झूमते उमंग भरी तरुलताओं में खिले फूल हैं सोह रहे!
कानन – कानन में फल-फूल पर गूंज रहे हैं भौरों के झुंड!
दे रही है आमोदित धरती उषादेवी को सुखद निमंत्रण!

कन्नड़ कविता हिन्दी में : कुपल्ली वेंकटप्पागौड़ा पुटप्पा (कुवेम्पु)
Kannada Poetry in Hindi : Kuppali Venkatappa Puttappa (Kuvempu)

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