इन्द्रधनुष

लो, खिंच गया इन्द्रधनुष आकाश पर
मानो नभदेवी ने किया हो मणिमाला से शृंगार।
रुक जा मित्र, मूकविस्मित हो, रुक जा,
मंदिर के सामने हाथ जोड़कर खड़े होनेवाले भक्त जैसे!

मानो धनुष बन गया हो सौंदर्य-चेतना,
मानो माया से अंकित मधुर चित्र हो यह,
मानो गा रहा हो आदिकवि कोई सुन्दर गीत,
मानो बज रहा हो वादक वीणा का तार!

इन्द्रधनुष-सा क्षणिक है जीवन तो क्या हुआ?
इन्द्रधनुष जैसा वह मधुरतम तो है ना?
गरिमामय जीवन एक दिन का ही क्यों न हो?
निकृष्ट जीवन हो युग-युग तक क्यों?

कन्नड़ कविता हिन्दी में : कुपल्ली वेंकटप्पागौड़ा पुटप्पा (कुवेम्पु)
Kannada Poetry in Hindi : Kuppali Venkatappa Puttappa (Kuvempu)

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