अरमान

अगण्य क्षणों में से एकाध को पकड़
समय की अनंत कुहुकिकाएँ उनमें फूंक कर
स्फुरित कर जग में, कहते हैं :
‘हमारे ये अमर सुशोभित काव्य !’
अरे, सचमुच यही क्या कवि-ज़िन्दगी ?

जीवन के हैं अनेक क्षणपुंज,
दिव्य निजानुभव के क्षण तो हैं कुछ इनेगिने ही,
कर व्यक्त उन्हें शब्द के अपूर्ण अधूरे रूप में,
जीवन की इति मान ली जाये क्या ?
यही है चिरायु ?

अथाह महाकाश में, अन्तहीन इस महाकाल में
अणु-सी अल्प इस पृथ्वी के स्फुरित होते साँस चार
उसमें नगण्य मनुष्य की
की-न-की काव्यसृष्टि कहाँ ?
कब तक वह,
इस पृथ्वी की ही भस्म जहाँ
समग्र इतिहास पर उड़कर चादर चढ़ा देगी ?

फिर भी, हदय, गा ले
रह न जायें कहीं मन में अरमान !

(नवम्बर 1933)

गुजराती कविता हिन्दी में : उमाशंकर जोशी
Gujrati Poetry in Hindi : Umashankar Joshi

Leave a Reply